श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 140
 
 
श्लोक  13.18.140 
चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा अमृतो गोवृषेश्वर:।
साध्यर्षिर्वसुरादित्यो विवस्वान् सवितामृत:॥ १४०॥
 
 
अनुवाद
896 चराचरात्मा—प्राणियों की आत्मा, 897 सूक्ष्मात्मा—अत्यन्त सूक्ष्म रूप, 898 अमृतो गोव्रेश्वर:—निष्काम धर्म के स्वामी, 899 साध्यर्षि:—साध्य देवताओं के आचार्य, 900 आदित्यो वसु:—अदितिकुमार वसु, 901 विवस्वान सवितामृत:—जगत के रचयिता रूप किरणों और अमृत से सुशोभित सूर्य ॥140॥
 
896 Characharatma—soul of living beings, 897 Sukshmatma—very subtle form, 898 Amrito Govreshwar:—Lord of selfless religion, 899 Sadhyarshi:—Acharya of Sadhya deities, 900 Adityao Vasu:—Aditikumar Vasu, 901 Vivasvan Savitamrit:—Sun adorned with rays and nectar in the form of the creator of the world. 140॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)