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mahabharat 13.18.136: 866 ऊर्ध्वगात्म - जो देश-काल-वस्तुरूप से अतीत है, 867 पशुपति - जीवों का स्वामी, 868 वातारण्ह - वायु के समान वेगवान, 869 मनोजव - मन के समान वेगवान, 870 चांदनी - चंदन के सुप्रसिद्ध शरीर वाली, 871 पद्मनालग्र - पद्मनाल का मूल विष्णु रूप, 872 सुरभ्युत्तरण - सुरभि को नीचे उतारने वाला, 873 नर - पुरुष रूप ॥136॥   |   mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 136
 
 
श्लोक  13.18.136 
ऊर्ध्वगात्मा पशुपतिर्वातरंहा मनोजव:।
चन्दनी पद्मनालाग्र: सुरभ्युत्तरणो नर:॥ १३६॥
 
 
अनुवाद
866 ऊर्ध्वगात्म - जो देश-काल-वस्तुरूप से अतीत है, 867 पशुपति - जीवों का स्वामी, 868 वातारण्ह - वायु के समान वेगवान, 869 मनोजव - मन के समान वेगवान, 870 चांदनी - चंदन के सुप्रसिद्ध शरीर वाली, 871 पद्मनालग्र - पद्मनाल का मूल विष्णु रूप, 872 सुरभ्युत्तरण - सुरभि को नीचे उतारने वाला, 873 नर - पुरुष रूप ॥136॥
 
866 Urdhvagaatma—the one who is past the form of space-time-objectified title, 867 Pashupati:—lord of living beings, 868 Vataranha:—as swift as the wind, 869 Manojava:—as swift as the mind, 870 Chandani—the one with the well-known body of sandalwood, 871 Padmanalagra:—the original Vishnu form of Padmanala, 872 Surabhyuttarana:—one who brings down Surabhi, 873 Narah—male form. 136॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)