श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 128
 
 
श्लोक  13.18.128 
त्रिलोचनो विषण्णाङ्गो मणिविद्धो जटाधर:।
बिन्दुर्विसर्ग: सुमुख: शर: सर्वायुध: सह:॥ १२८॥
 
 
अनुवाद
800 शर:—बाण के रूप में, 810 सर्वायुध:—सम्पूर्ण शस्त्रों से युक्त, 811 सह:—सहनशील । 128॥
 
800 Shar:—in the form of an arrow, 810 Sarvayudh:—equipped with complete weapons, 811 Sah:—tolerant. 128॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)