श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  13.18.115 
धृतिमान् मतिमान् दक्ष: सत्कृतश्च युगाधिप:।
गोपालिर्गोपतिर्ग्रामो गोचर्मवसनो हरि:॥ ११५॥
 
 
अनुवाद
703 धृतिमान - धैर्यवान, 704 मतिमान - बुद्धिमान, 705 दक्ष - चतुर, 706 सत्कृत - सबके द्वारा आदरणीय, 707 युगाधिप - आयु के स्वामी, 708 गोपाली - इन्द्रियों के रक्षक, 709 गोपति - गौओं के स्वामी, 710 ग्राम - समूह रूप, 711 गोचर्मवासना - गौ के चमड़े से बने वस्त्र धारण करने वाले। कर्ता, 712 हरि: - भक्तों के दुःखों को दूर करने वाले । 115॥
 
703 Dhritiman—patient, 704 Matimaan—intelligent, 705 Daksh:—clever, 706 Satkrit:—respected by all, 707 Yugadhip:—lord of the age, 708 Gopali:—guardian of senses, 709 Gopati:—lord of cows, 710 gram:—group form, 711 Gocharmavasana:—wearing clothes made of cow hide. The doer, 712 Hariḥ—the remover of the sorrows of the devotees. 115॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)