श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  13.18.105 
प्रभाव: सर्वगो वायुरर्यमा सविता रवि:।
उषङ्गुश्च विधाता च मान्धाता भूतभावन:॥ १०५॥
 
 
अनुवाद
626 प्रभावः—उत्कृष्टता से परिपूर्ण, 627 सर्वगो वायुः—सर्वव्यापी वायु—सूत्रात्मा, 628 अर्यमा—बारह आदित्यों में एक आदित्य आर्यमरूप, 629 सविता—जिसने सम्पूर्ण जगत् की रचना की, 630 रविः—सूर्य, 631 उषंगुः—सर्वदा जलाने वाली किरणों वाला सूर्यरूप, 632 विधाता—जो विशेष रूप से लोगों का पालन करता है, 633 मान्धाता—जीवों को तृप्ति प्रदान करने वाला, 634 भूतभावन—सभी जीवों का उत्पादक ॥105॥
 
626 Prabhav:—full of excellence, 627 Sarvago Vayu:—omnipresent Vayu—Sutrasatma, 628 Aryama—one Aditya Aryamarupa among the twelve Adityas, 629 Savita—the one who created the entire world, 630 Ravi:—the Sun, 631 Ushangu:—the Sun form with all-burning rays, 632 Vidhaata—the one who especially sustains the people, 633 Mandhaata—one who provides satisfaction to the living beings, 634 Bhootbhavan:—producer of all living beings. 105॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)