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mahabharat 13.18.100: 580 उग्र:—जो प्रलयकाल में भयंकर रूप धारण करते हैं, 581 वंशकार:—वंश को प्रारम्भ करने वाले, 582 वंश:—वंश का रूप, 583 वंशनाद:—जो श्रीकृष्ण के रूप में वंशी बजाते हैं, 584 अनिंदित:—निंदा रहित, 585 सर्वांगरूप:—सर्वांगपूर्ण रूप वाले, 586 मायावी, 587 सुहृद:—अकारण दयालु, 588 अनिल:—वायु रूप, 589 अनल:—अग्नि रूप । 100॥   |   mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  13.18.100 
उग्रो वंशकरो वंशो वंशनादो ह्यनिन्दित:।
सर्वाङ्गरूपो मायावी सुहृदो ह्यनिलोऽनल:॥ १००॥
 
 
अनुवाद
580 उग्र:—जो प्रलयकाल में भयंकर रूप धारण करते हैं, 581 वंशकार:—वंश को प्रारम्भ करने वाले, 582 वंश:—वंश का रूप, 583 वंशनाद:—जो श्रीकृष्ण के रूप में वंशी बजाते हैं, 584 अनिंदित:—निंदा रहित, 585 सर्वांगरूप:—सर्वांगपूर्ण रूप वाले, 586 मायावी, 587 सुहृद:—अकारण दयालु, 588 अनिल:—वायु रूप, 589 अनल:—अग्नि रूप । 100॥
 
580 Ugra:—one who assumes a terrible form in the time of destruction, 581 vanshkar:—initiator of lineage, 582 vansh:—form of lineage, 583 vanshanad:—one who plays flute in the form of Shri Krishna, 584 anindit:—without condemnation, 585 sarvangarup:—one with all-round complete form, 586 elusive—, 587 suhrid:—kind without cause, 588 Anil:—air form, 589 Anal:—fire form. 100॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)