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श्लोक 13.179.46  |
एतादृश: केशवोऽतश्च भूयो
नारायण: परमश्चाव्ययश्च।
मध्याद्यन्तस्य जगतस्तस्थुषश्च
बुभूषतां प्रभवश्चाव्ययश्च॥ ४६॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान कृष्ण की महिमा ऐसी ही है। वास्तव में, वे तो और भी अधिक प्रभावशाली हैं। ये ही परम पुरुष, अविनाशी नारायण हैं। ये ही स्थावर-जंगम जगत के आदि, मध्य और अन्त हैं तथा इस जगत में जन्म लेने की इच्छा रखने वाले जीवों की उत्पत्ति का कारण भी ये ही हैं। इन्हें ही निर्विकार परमेश्वर कहते हैं। 46॥ |
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| Such is the glory of Lord Krishna. In fact, they are even more impressive. This is the supreme man, the indestructible Narayana. These are the beginning, middle and end of the movable and immovable world and they are also the reason for the origin of the living beings who wish to take birth in this world. This is called the Immutable God. 46॥ |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि महापुरुषमाहात्म्ये अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें महापुरुषमाहात्म्यविषयक एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५८॥
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