श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 179: भीष्मजीके द्वारा भगवान‍् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  13.179.45 
यत् प्रशस्तं च लोकेषु पुण्यं यच्च शुभाशुभम्।
तत्सर्वं केशवोऽचिन्त्यो विपरीतमत: परम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
तीनों लोकों में जो कुछ भी शुभ, पवित्र, शुभ या अशुभ है, वह सब अचिन्त्य भगवान् कृष्ण का ही स्वरूप है। कृष्ण के अतिरिक्त अन्य कुछ भी है, ऐसा सोचना अपनी ही विरोधाभासी बुद्धि का प्रदर्शन है ॥45॥
 
Whatever is good, holy, auspicious or inauspicious in the three worlds is the manifestation of the inconceivable Lord Krishna. To think that there is anything other than Krishna is to display one's own contradictory intellect. ॥45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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