श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 179: भीष्मजीके द्वारा भगवान‍् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  13.179.40 
स पञ्चधा पञ्चजनोपपन्नं
संचोदयन् विश्वमिदं सिसृक्षु:।
ततश्चकारावनिमारुतौ च
खं ज्योतिरम्भश्च तथैव पार्थ॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीकुमार! वे देवता, दानव, मनुष्य, पितर और तिर्यग् रूप से पाँच प्रकार के लोकों की रचना करना चाहते हैं और पाँच तत्त्वों से युक्त जगत् के प्रेरक होकर सबको अपने अधीन रखते हैं। उन्होंने क्रमशः पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश की रचना की है। 40॥
 
Kuntikumar! He wishes to create five types of worlds from the form of gods, demons, humans, ancestors and Tiryagy, and by being the inspirer of the world consisting of five elements, he keeps everyone under his control. He has created earth, water, light, air and sky respectively. 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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