श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 179: भीष्मजीके द्वारा भगवान‍् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  13.179.4 
बलं श्रोत्रे वाङ्मनश्चक्षुषी च
ज्ञानं तथा सविशुद्धं ममाद्य।
देहन्यासो नातिचिरान्मतो मे
न चाति तूर्णं सविताद्य याति॥ ४॥
 
 
अनुवाद
आज मेरा बल, मेरे कान, मेरी वाणी, मेरा मन, मेरे नेत्र और मेरा शुद्ध ज्ञान, ये सब एकत्रित हो गए हैं। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि अब मुझे शरीर त्यागने में अधिक समय नहीं लगेगा। आज सूर्यदेव बहुत तीव्र गति से नहीं चल रहे हैं। ॥4॥
 
Today my strength, my ears, my speech, my mind, my eyes and my pure knowledge have all come together. Therefore it seems that now it will not take much time for me to leave my body. Today the Sun God is not moving very fast. ॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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