श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 179: भीष्मजीके द्वारा भगवान‍् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  13.179.35 
वायुर्भूत्वा विक्षिपते च विश्व-
मग्निर्भूत्वा दहते विश्वरूप:।
आपो भूत्वा मज्जयते च सर्वं
ब्रह्मा भूत्वा सृजते विश्वसंघान्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
ये विश्वरूपी श्रीकृष्ण ही वायुरूप धारण करके जगत् को शांति प्रदान करते हैं, अग्निरूप धारण करके सबको भस्म कर देते हैं, जलरूप धारण करके जगत् को डुबा देते हैं और ब्रह्मारूप धारण करके सम्पूर्ण जगत् की रचना करते हैं॥35॥
 
It is this world form Shri Krishna who provides peace to the world by taking the form of air, by taking the form of fire he consumes everyone, by taking the form of water he drowns the world and by taking the form of Brahma he creates the entire world. 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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