श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 179: भीष्मजीके द्वारा भगवान‍् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  13.179.21 
स देवानां मानुषाणां पितृॄृणां
तमेवाहुर्यज्ञविदां वितानम्।
स एव कालं विभजन्नुदेति
तस्योत्तरं दक्षिणं चायने द्वे॥ २१॥
 
 
अनुवाद
ये श्रीकृष्ण समस्त देवताओं, पितरों और मनुष्यों की आत्मा हैं। इन्हें यज्ञज्ञों का यज्ञ कहा गया है। ये दिन और रात का विभाजन करते हुए सूर्य के रूप में उदय होते हैं। उत्तरायण और दक्षिणायन इनके दो मार्ग हैं।
 
This Shri Krishna is the soul of all the gods, ancestors and human beings. He is called the Yagya of those who know about Yagyas. He rises in the form of the Sun while dividing the day and night. Uttarayan and Dakshinayan are his two paths.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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