श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 176: ब्रह्मर्षि अगस्त्य और वसिष्ठके प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  13.176.26 
एतत् कर्म वसिष्ठस्य कथितं हि मयानघ।
ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वं वसिष्ठात् क्षत्रियं वरम्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
हे भोले राजन! मैंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ का यह कार्य वर्णित किया है। मैं कहता हूँ, ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं। यदि वसिष्ठ से भी बड़ा कोई क्षत्रिय हो, तो मुझे बताइए।॥26॥
 
Innocent king! I have described this deed of Brahmarshi Vasishtha. I say, Brahmins are superior. If there is any Kshatriya greater than Vasishtha, then tell me.'॥ 26॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायु देवता और कार्तवीर्य अर्जुनका संवादविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५५॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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