श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 176: ब्रह्मर्षि अगस्त्य और वसिष्ठके प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  13.176.2-3 
असुरैर्निर्जिता देवा निरुत्साहाश्च ते कृता:।
यज्ञाश्चैषां हृता: सर्वे पितृॄृणां च स्वधास्तथा॥ २॥
कर्मेज्या मानवानां च दानवैर्हैहयर्षभ।
भ्रष्टैश्वर्यास्ततो देवाश्चेरु: पृथ्वीमिति श्रुति:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हैहयराज! प्राचीन काल में दैत्यों ने देवताओं को परास्त करके उनका उत्साह नष्ट कर दिया। दैत्यों ने देवताओं के यज्ञ, पितरों के श्राद्ध और मनुष्यों के कर्मकाण्ड नष्ट कर दिए। तब देवतागण अपने ऐश्वर्य से भ्रष्ट होकर निराश होकर पृथ्वी पर विचरण करने लगे। ऐसा सुना गया है॥ 2-3॥
 
Haihayraj! In ancient times, the demons defeated the gods and destroyed their enthusiasm. The demons destroyed the yagnas of the gods, the shraddhas of the ancestors and the rituals of the humans. Then the gods, corrupted by their opulence, started wandering around the earth in despair. It has been heard so.॥ 2-3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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