श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 176: ब्रह्मर्षि अगस्त्य और वसिष्ठके प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  13.176.12 
इत्युक्त: प्राह देवान् स न शक्तोऽस्मि महीगतान्।
दग्धुं तपो हि क्षीयेन्मे न शक्यामीति पार्थिव॥ १२॥
 
 
अनुवाद
हे पृथ्वीपति! देवताओं के ऐसा कहने पर अगस्त्यजी ने उनसे कहा - 'अब मैं पृथ्वी पर रहने वाले दैत्यों को नहीं जला सकता; क्योंकि ऐसा करने से मेरी तपस्या क्षीण हो जाएगी। अतः यह कार्य मेरे लिए असम्भव है।'॥12॥
 
‘Lord of the Earth! When the gods said this, Agastyaji said to them – ‘Now I cannot burn the demons residing on the earth; because by doing so my penance will be weakened. Therefore this task is impossible for me.’॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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