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श्लोक 13.176.12  |
इत्युक्त: प्राह देवान् स न शक्तोऽस्मि महीगतान्।
दग्धुं तपो हि क्षीयेन्मे न शक्यामीति पार्थिव॥ १२॥ |
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| अनुवाद |
| हे पृथ्वीपति! देवताओं के ऐसा कहने पर अगस्त्यजी ने उनसे कहा - 'अब मैं पृथ्वी पर रहने वाले दैत्यों को नहीं जला सकता; क्योंकि ऐसा करने से मेरी तपस्या क्षीण हो जाएगी। अतः यह कार्य मेरे लिए असम्भव है।'॥12॥ |
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| ‘Lord of the Earth! When the gods said this, Agastyaji said to them – ‘Now I cannot burn the demons residing on the earth; because by doing so my penance will be weakened. Therefore this task is impossible for me.’॥ 12॥ |
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