श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 174: वायुद्वारा उदाहरणसहित ब्राह्मणोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  13.174.8 
सुवर्णवर्णो निर्धूम: सङ्गतोर्ध्वशिख: कवि:।
क्रुद्धेनाङ्गिरसा शप्तो गुणैरेतैर्विवर्जित:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
पहले अग्नि का रंग सोने के समान था, उससे धुआँ नहीं निकलता था और उसकी लपटें सदैव ऊपर की ओर उठती रहती थीं, किन्तु क्रोध में भरकर अंगिरा ऋषि ने उसे शाप दे दिया। अतः अब उसमें ये पूर्वोक्त गुण नहीं रहे ॥8॥
 
Earlier the colour of the fire was like gold, it did not emit smoke and its flames always rose upwards, but the sage Angira, filled with anger, cursed it. Therefore, now it does not have these above mentioned qualities. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)