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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 173: कार्तवीर्य अर्जुनको दत्तात्रेयजी से चार वरदान प्राप्त होनेका एवं उनमें अभिमानकी उत्पत्तिका वर्णन तथा ब्राह्मणोंकी महिमाके विषयमें कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 5-6h
 
 
श्लोक  13.173.5-6h 
स्ववित्तं तेन दत्तं तु दत्तात्रेयाय कारणे।
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य विनयं श्रुतमेव च॥ ५॥
आराधयामास च तं कृतवीर्यात्मजो मुनिम्।
 
 
अनुवाद
एक समय क्षत्रिय-धर्म को ध्यान में रखते हुए महावीर्यपुत्र अर्जुन ने अपनी विनम्रता और शास्त्र-ज्ञान के अनुसार दीर्घकाल तक दत्तात्रेय मुनि की पूजा की और किसी कारणवश अपनी समस्त सम्पत्ति उनकी सेवा में दान कर दी॥5 1/2॥
 
Once, keeping the Kshatriya-dharma in mind, Arjuna, the son of great Virya, worshipped the sage Dattatreya for a long time according to his humility and knowledge of the scriptures, and for some reason, he donated all his wealth to his service. ॥ 5 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)