श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 173: कार्तवीर्य अर्जुनको दत्तात्रेयजी से चार वरदान प्राप्त होनेका एवं उनमें अभिमानकी उत्पत्तिका वर्णन तथा ब्राह्मणोंकी महिमाके विषयमें कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  13.173.19 
सर्वभूतप्रधानांस्तान् भैक्षवृत्तीनहं सदा।
आत्मसम्भावितान् विप्रान् स्थापयाम्यात्मनो वशे॥ १९॥
 
 
अनुवाद
जो समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ माने जाते हैं, जो सदैव भिक्षाटन द्वारा जीविका चलाते हैं और अपने को श्रेष्ठ मानते हैं, उन ब्राह्मणों को मैं आज से अपने अधीन रखूँगा॥19॥
 
From today onwards I will keep under my control the Brahmins who are considered the best of all creatures, who always earn their living by begging and who consider themselves the best.॥ 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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