श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 173: कार्तवीर्य अर्जुनको दत्तात्रेयजी से चार वरदान प्राप्त होनेका एवं उनमें अभिमानकी उत्पत्तिका वर्णन तथा ब्राह्मणोंकी महिमाके विषयमें कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.173.17 
ब्राह्मणा: संश्रिता: क्षत्रं न क्षत्रं ब्राह्मणाश्रितम्।
श्रिता ब्रह्मोपधा विप्रा: खादन्ति क्षत्रियान् भुवि॥ १७॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण अपनी जीविका के लिए क्षत्रियों पर निर्भर रहते हैं, परन्तु क्षत्रिय कभी ब्राह्मणों के संरक्षण में नहीं रहते। वेदों के अध्ययन-अध्यापन पर ब्याज कमाकर जीविका चलाने वाले ब्राह्मण इस पृथ्वी पर क्षत्रियों की सहायता से ही अपना आहार प्राप्त करते हैं।॥17॥
 
Brahmins depend on Kshatriyas for their livelihood, but Kshatriyas never live under the protection of Brahmins. Brahmins who earn their livelihood by earning interest on the study and teaching of Vedas, get their food on this earth with the help of Kshatriyas.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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