श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 173: कार्तवीर्य अर्जुनको दत्तात्रेयजी से चार वरदान प्राप्त होनेका एवं उनमें अभिमानकी उत्पत्तिका वर्णन तथा ब्राह्मणोंकी महिमाके विषयमें कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  13.173.13-14 
तद्वाक्यान्ते चान्तरिक्षे वागुवाचाशरीरिणी॥ १३॥
न त्वं मूढ विजानीषे ब्राह्मणं क्षत्रियाद् वरम्।
सहितो ब्राह्मणेनेह क्षत्रिय: शास्ति वै प्रजा:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
उसके इतना कहते ही आकाशवाणी हुई, "मूर्ख! तू यह नहीं जानता कि ब्राह्मण क्षत्रिय से श्रेष्ठ है। ब्राह्मण की सहायता से ही क्षत्रिय इस लोक में अपनी प्रजा की रक्षा करता है।" ॥13-14॥
 
As soon as he finished saying this, a voice from the sky said, "Fool! You don't know that a Brahmin is superior to a Kshatriya. It is with the help of a Brahmin that a Kshatriya protects his subjects in this world." ॥13-14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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