श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 171: जपनेयोग्य मन्त्र और सबेरे-शाम कीर्तन करनेयोग्य देवता, ऋषियों और राजाओंके मंगलमय नामोंका कीर्तन-माहात्म्य तथा गायत्रीजपका फल  »  श्लोक 25-29h
 
 
श्लोक  13.171.25-29h 
नन्दीश्वरो महाकायो ग्रामणीर्वृषभध्वज:।
ईश्वरा: सर्वलोकानां गणेश्वरविनायका:॥ २५॥
सौम्या रौद्रा गणाश्चैव योगभूतगणास्तथा।
ज्योतींषि सरितो व्योम सुपर्ण: पतगेश्वर:॥ २६॥
पृथिव्यां तपसा सिद्धा: स्थावराश्च चराश्च ह।
हिमवान् गिरय: सर्वे चत्वारश्च महार्णवा:॥ २७॥
भवस्यानुचराश्चैव हरतुल्यपराक्रमा:।
विष्णुर्देवोऽथ जिष्णुश्च स्कन्दश्चाम्बिकया सह॥ २८॥
कीर्तयन् प्रयत: सर्वान् सर्वपापै: प्रमुच्यते।
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार नन्दीश्वर, महाकाय, ग्रामणी, वृषभध्वज, सम्पूर्ण लोकों के स्वामी गणेश, विनायक, सौम्यगण, रुद्रगण, योगगण, भूतगण, नक्षत्रगण, नदियाँ, आकाश, पक्षीराज गरुड़, पृथ्वी पर तपस्या द्वारा सिद्ध हुए महात्मा, स्थावर, जंगम, हिमालय, सम्पूर्ण पर्वत, चारों समुद्र, भगवान शंकर के समान पराक्रम वाले उनके अनुयायी, विष्णुदेव, जिष्णु, स्कन्द और अम्बिका: इन नामों का शुद्ध भाव से जप करने वाले मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। 25—28 1/2॥
 
Similarly, Nandishwar, Mahakaya, Gramani, Vrishabhadhwaja, Lord of all the worlds Ganesh, Vinayaka, Soumyagan, Rudragan, Yoggan, ghosts, constellations, rivers, sky, king of birds Garuda, Mahatma who has become perfect through penance on earth, immovable, movable, Himalayas, all the mountains, all the four seas, his followers with prowess equal to Lord Shankar, Vishnudev, Jishnu, Skanda and Ambika: All the sins of a person who chants these names with pure feelings are destroyed. 25—28 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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