श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 170: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  13.170.95 
चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गति:।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात्॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
765 चतुर्मूर्ति:- राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न के रूप में चार मूर्तियों वाले, 766 चतुर्बाहु:- चार भुजाओं वाले, 767 चतुर्व्यूह:- चार व्यूहों से युक्त - वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध, 768 चतुर्गति:- सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य इन चार परम गतियों के रूप में, 769 चतुरात्मा। 770 चतुर्भाव - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - इन चार पुरुषों का मूल, 771 चतुर्वेदावित - जो चारों वेदों के अर्थ को अच्छी तरह जानता है, 772 एकपात - एक पाद वाला अर्थात् एक पैर (भाग) - सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है। कर्ता
 
765 Chaturmurti: - having four statues in the form of Ram, Lakshman, Bharat, Shatrughna, 766 Chaturbahu: - having four arms, 767 Chaturvyuh: - consisting of four arrays - Vasudev, Sankarshana, Pradyumna and Aniruddha, 768 Chaturgati: - Salokya, Samipya, Sarupya, Sayujya in the form of four ultimate movements, 769 Chaturtma. 770 Chaturbhaav - Dharma, Artha, Kama and Moksha - the origin of these four efforts, 771 Chaturvedavit - one who knows the meaning of the four Vedas very well, 772 Ekapat - one footed i.e. one foot (part) - pervades the entire world. The doer
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)