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mahabharat 13.170.79: 615 स्वक्ष:- जिनके नेत्र अत्यंत सुंदर हैं, जो मनोहर लावण्य और व्यंग्य से युक्त हैं, 616 स्वांग:- अत्यंत कोमल, अत्यंत सुंदर, मनमोहक अंगों वाले, 617 शतानन्द:- लीलाभेद द्वारा सैकड़ों विभागों में विभक्त आनन्दस्वरूप, 618 नन्दी:- आनन्दस्वरूप, 619 ज्योतिर्गणेश्वर:- नक्षत्रों के देवता, 620 विजयात्मा - जीतने वाले मन वाले, 621 अविधेयात्मा - जिनका वास्तविक रूप किसी भी प्रकार वर्णित नहीं किया जा सकता - ऐसा अवर्णनीय रूप, 622 सत्कीर्ति:- सच्ची कीर्ति वाले, 623 छिन्नसंशय:- सभी प्रकार के संशय से रहित । 79॥   |   mahabharat अध्याय 13.170: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 170: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्  »  श्लोक 79
 
 
श्लोक  13.170.79 
स्वक्ष: स्वङ्ग: शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वर:।
विजितात्माविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशय:॥ ७९॥
 
 
अनुवाद
615 स्वक्ष:- जिनके नेत्र अत्यंत सुंदर हैं, जो मनोहर लावण्य और व्यंग्य से युक्त हैं, 616 स्वांग:- अत्यंत कोमल, अत्यंत सुंदर, मनमोहक अंगों वाले, 617 शतानन्द:- लीलाभेद द्वारा सैकड़ों विभागों में विभक्त आनन्दस्वरूप, 618 नन्दी:- आनन्दस्वरूप, 619 ज्योतिर्गणेश्वर:- नक्षत्रों के देवता, 620 विजयात्मा - जीतने वाले मन वाले, 621 अविधेयात्मा - जिनका वास्तविक रूप किसी भी प्रकार वर्णित नहीं किया जा सकता - ऐसा अवर्णनीय रूप, 622 सत्कीर्ति:- सच्ची कीर्ति वाले, 623 छिन्नसंशय:- सभी प्रकार के संशय से रहित । 79॥
 
615 Swaksh: - the one with very beautiful eyes full of charming grace and sarcasm, 616 Swang: - very soft, extremely beautiful, with lovely body parts, 617 Shatanand: - the form of joy divided into hundreds of departments by Leelabheda, 618 Nandi: - the form of bliss, 619 Jyotirganeshwar: - the God of constellations, 620 Vijayatma - the one with a winning mind, 621 Avidheyatma -whose real form cannot be described in any way - such indescribable form, 622 Satkirti: -one with true fame, 623 Chhinsanshay: -free from all kinds of doubts. 79॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)