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mahabharat 13.170.67: 503 सोमपा:- यज्ञों में देवता और यजमान के रूप में सोमरस का पान करने वाला। देने वाला, 509 जय:- सबको जीतने वाला, 510 सत्यसन्ध:- सत्य व्रत करने वाला, 511 दाशार्ह:- दाशार्ह के कुल में प्रकट होने वाला, 512 सात्वतम् पति:- यादवों और अपने भक्तों का स्वामी ॥67॥   |   mahabharat अध्याय 13.170: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 170: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  13.170.67 
सोमपोऽमृतप: सोम: पुरुजित् पुरुसत्तम:।
विनयो जय: सत्यसंधो दाशार्ह: सात्वतां पति:॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
503 सोमपा:- यज्ञों में देवता और यजमान के रूप में सोमरस का पान करने वाला। देने वाला, 509 जय:- सबको जीतने वाला, 510 सत्यसन्ध:- सत्य व्रत करने वाला, 511 दाशार्ह:- दाशार्ह के कुल में प्रकट होने वाला, 512 सात्वतम् पति:- यादवों और अपने भक्तों का स्वामी ॥67॥
 
503 Sompa: - One who drinks Somra in Yagyas in the form of a deity and as a host. The one who gives, 509 Jai: - the one who conquers all, 510 Satyasandh: - the one who makes true vows, 511 Dasharh: - the one who appears in the family of Dasharh, 512 Satvatam Pati: - the lord of the Yadavas and his devotees. 67॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)