श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 170: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  13.170.65 
गभस्तिनेमि: सत्त्वस्थ: सिंहो भूतमहेश्वर:।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्‍गुरु:॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
486 गभस्तिनेमि:- सूर्यरूप किरणों के मध्य में स्थित, 487 सत्वस्थ:- अंतर्यामी रूप से समस्त प्राणियों के हृदय में निवास करने वाले, 488 सिंह:- भक्त प्रह्लाद के लिए मानव सिंह का रूप धारण करने वाले, 489 भूतमहेश्वर:- समस्त प्राणियों के महान ईश्वर, 490 आदिदेव:- सबके मूल कारण एवं दिव्य स्वरूप, 491 महादेव:- ज्ञान और योग आदि ऐश्वर्यों से युक्त, 492 देवेश:- समस्त देवताओं के स्वामी, 493 देवभृद्गुरु:- देवताओं के परम गुरु जो उनका विशेष रूप से पोषण करते हैं ॥65॥
 
486 Gabhastinemi: - situated in the middle of the rays in the form of the sun, 487 Satvastha: - the one who resides in the heart of all living beings in the form of Antaryami, 488 Singh: - the one who assumes the form of a human lion for devotee Prahlad, 489 Bhootmaheshwar: - the great God of all beings, 490 Adidev: - the original cause and divine form of all, 491 Mahadev: - knowledge and yoga. Full of opulences etc., 492 Devesh: - Lord of all the gods, 493 Devbhridguru: - The supreme guru of the gods who specially nourishes them. 65॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)