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mahabharat 13.170.60: 435 अनिर्विन्न: - ऊब आदि विकारों से रहित, 436 स्थविष्ठ: - विराट रूप में स्थित, 437 अभू: - अजन्मा, 438 धर्मयूप: - धर्म का आधार, 439 महामख: - महायज्ञ का स्वरूप, 440 नक्षत्रनेमि: - समस्त नक्षत्रों का मध्य रूप, 441 नक्षत्री - चन्द्रमा का रूप, 442 क्षम: - सम्पूर्ण। कार्यों में समर्थ, 443 क्षम: - सम्पूर्ण जगत् का निवास, 444 समिहान: - सृष्टि आदि के लिए उत्तम प्रयास करने वाले । 60॥   |   mahabharat अध्याय 13.170: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 170: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  13.170.60 
अनिर्विण्ण: स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामख:।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षम: क्षाम: समीहन:॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
435 अनिर्विन्न: - ऊब आदि विकारों से रहित, 436 स्थविष्ठ: - विराट रूप में स्थित, 437 अभू: - अजन्मा, 438 धर्मयूप: - धर्म का आधार, 439 महामख: - महायज्ञ का स्वरूप, 440 नक्षत्रनेमि: - समस्त नक्षत्रों का मध्य रूप, 441 नक्षत्री - चन्द्रमा का रूप, 442 क्षम: - सम्पूर्ण। कार्यों में समर्थ, 443 क्षम: - सम्पूर्ण जगत् का निवास, 444 समिहान: - सृष्टि आदि के लिए उत्तम प्रयास करने वाले । 60॥
 
435 Anirvinna: -Free from the disorders like boredom, 436 Sthavishtha: -Situated in the form of Virat, 437 Abhu: -Unborn, 438 Dharmayup: -The pillar of religion, 439 Mahamakh: -The form of great sacrifice, 440 Nakshatranemi: -The center form of all the constellations, 441 Nakshatri -The form of the moon, 442 Ksham: -The whole. Capable in works, 443 Kshaam: - the abode of the entire world, 444 Samihan: - those who make good efforts for creation etc. 60॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)