श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 170: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  13.170.49 
स्कन्द: स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहन:।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेव: पुरंदर:॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
327 स्कन्द:- स्वामिकार्ति का स्वरूप, 328 स्कन्दधर:- धर्म के मार्ग पर चलने वाले, 329 धू्र्य:- धुर्को धारण करने वाले, सम्पूर्ण भूतों के जन्म स्वरूप, 330 वरद:- इच्छित वर देने वाले, 331 वायुवाहन:- समस्त प्रकार की वायु को नियंत्रित करने वाले, 332 वासुदेव:- सम्पूर्ण भूतों में परमात्मा के रूप में निवास करने वाले, 333 बृहद्भानु:- महान किरणों वाले तथा सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करने वाले सूर्य के स्वरूप, 334 आदिदेव:- सबके आदिदेव, 335 पुरन्दर:- दैत्यों के नगरों का नाश करने वाले ॥49॥
 
327 Skanda: - Swamikarthi's form, 328 Skandadhar: - The one who follows the path of religion, 329 Dhurya: - The one who wears Dhurko, the birth form of all the ghosts, 330 Varad: - The one who gives the desired boon, 331 Vayuvahan: - The one who controls all the types of air, 332 Vasudev: - The one who resides in the form of Supreme Soul in all the ghosts, 333 Brihadbhanu: -The form of the sun with great rays and illuminating the whole world, 334 Adidev: -The original god of all, 335 Purandar: -The one who destroys the cities of demons. 49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)