श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 170: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  13.170.46 
युगादिकृद् युगावर्तो नैकमायो महाशन:।
अदृश्योऽव्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
300 युगादिकृत - युगादिका का प्रारंभ करने वाला, 301 युगावर्त - चारों युगों को चक्र के समान घुमाने वाला, 302 नैकमय - अनेक मोहों को धारण करने वाला, 303 महाशन - कल्प के अंत में सबको ग्रस लेने वाला, 304 अदृश्य - समस्त इन्द्रियों के अधीन, 305 अव्यक्तरूप - निराकार रूप वाला, 306 सहस्रजित - युद्ध में हजारों की संख्या वाला, देवताओं के शत्रुओं को जीतने वाला, 307 अनंतजित - युद्ध और क्रीड़ा आदि में सर्वत्र समस्त भूतों को जीतने वाला ॥46॥
 
300 Yugadikrit - One who starts Yugadika, 301 Yugavarta: - One who rotates the four yugas like a wheel, 302 Naikmay: - One who embraces many illusions, 303 Mahashan: - One who consumes everyone at the end of the Kalpa, 304 Invisible: - Subject to all sense organs, 305 Avyaktarup: - One who has formless form, 306 Sahasrajit - Thousands in war. The one who conquers the enemies of Gods, 307 Anantjit - the one who conquers all the ghosts everywhere in war and sports etc. 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)