श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 170: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  13.170.42 
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसु:।
नैकरूपो बृहद्रूप: शिपिविष्ट: प्रकाशन:॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
265 सुभुज: -अत्यन्त सुन्दर भुजाओं वाले, जो जगत् की रक्षा करते हैं, 266 दुर्धर: -जिन्हें ध्यान द्वारा कठिनाई से धारण किया जा सके, 267 वाक्पटु - जो वेदमयी वाणी को जन्म देते हैं, 268 महेन्द्र: -देवताओं के स्वामी, 269 वसु: -धन देने वाले, 270 वसु: -धन के स्वरूप, 271 नैकरूप: -अनेक रूपों को धारण करने वाले, 272 बृहद्रूप: -विश्वरूप धारी, 273 शिपिविष्ठ: -जो सूर्यकिरणों में निवास करते हैं, 274 प्रकाशन: -जो सबको प्रकाशित करते हैं ॥42॥
 
265 Subhuj: -one with very beautiful arms that protects the world, 266 Durdhar: -one who can be held with difficulty by meditation, 267 eloquent -one who gives birth to Vedamayi speech, 268 Mahendra: -Lord of gods, 269 Vasud: -one who gives wealth, 270 Vasu: -form of wealth, 271 Naikroop: -bearer of many forms, 272 Brihadrup: -Vishwaroop Dhari, 273 Shipivishtha: -Who resides in the sunrays, 274 Prakashan: -Who illuminates everyone. 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)