श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 170: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  13.170.117 
भूर्भुव:स्वस्तरुस्तार: सविता प्रपितामह:।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहन:॥ ११७॥
 
 
अनुवाद
967 भूर्भुवः स्वस्तेरुः- 'भूः भुवः स्वः' तीनों लोकों के स्वामी, संसार वृक्ष के स्वरूप, 968 तारः- संसार-सागर को पार करने वाले, 969 सविता- सबको जन्म देने वाले, 970 प्रपितामहः- पितामह ब्रह्मा के भी पिता, 971 यज्ञः- यज्ञ के स्वरूप, 972 यज्ञपतिः- समस्त यज्ञों के अधिष्ठाता, 973 यज्वा- यजमान के रूप में यज्ञ करने वाले, 974 यज्ञयागः- यज्ञ के समस्त अंगों से युक्त, वराहस्वरूप, 975 यज्ञवाहनः- यज्ञों को चलाने वाले । 117॥
 
967 Bhurbhuva: Swastaru: - 'Bhu: Bhuva: Swa:' The possessor of the three worlds, the form of the world tree, 968 Tar: - the one who crosses the world-ocean, 969 Savita - the one who gives birth to all, 970 Prapitamaha: - the father of Grandfather Brahma too, 971 Yagya: - the form of Yagya, 972 Yajnapati: - the presiding deity of all Yagyas, 973 Yajva - one who performs Yagya in the form of a host, 974 Yajnyag: - one with all the organs of Yagya, Varahasvarupa, 975 Yagyavahan: - one who drives the Yagyas. 117॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)