श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 170: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्  »  श्लोक 116
 
 
श्लोक  13.170.116 
प्रमाणं प्राणनिलय: प्राणभृत् प्राणजीवन:।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिग:॥ ११६॥
 
 
अनुवाद
959 प्रमाणम् - आत्मनिर्भर होकर आत्मसाक्षात्कार करने वाला, 960 प्राणिनिलयः - जीवन का आधार, 961 प्राणभृत् - समस्त प्राणों का पोषण करने वाला, 962 प्राणजीवन: - प्राणवायु के संचार द्वारा जीवों को जीवित रखने वाला, 963 तत्त्वम् - सत्य तत्त्व का स्वरूप, 964 तत्त्ववित् - सत्य तत्त्व को पूर्णतः जानने वाला, 965 एकात्मा - अद्वितीय स्वरूप, 966 जन्ममृत्युजरतिग: - शरीर के जन्म, मृत्यु और जरा आदि धर्मों से पूर्णतया परे । 116॥
 
959 Pramanam - Self-realized by being self-sufficient, 960 Prananilayah - the foundation of life, 961 Pranabhrit - one who nourishes all life, 962 Pranajeevan: - One who keeps living beings alive through the circulation of vital air, 963 Tattvam - the form of the true element, 964 Tattvavit - one who knows the true element completely, 965 Ekatma - the unique form, 966 Janammrityujaratig: -Completely beyond the dharma of birth, death and old age etc. of the body. 116॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)