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mahabharat 13.17.7-8: ऐसा कहकर तण्डि को उस तपोनिधि, अविनाशी, अनुपम, अचिन्त्य, नित्य, ध्रुव, शुद्ध, स्थूल, निर्गुण और सगुण ब्रह्म का दर्शन हुआ, जो आनंदस्वरूप, अविनाशी और योगियों का मोक्षस्वरूप है॥7-8॥   |   mahabharat अध्याय 13.17: उपमन्यु-श्रीकृष्ण-संवाद—महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.17.7-8 
एवं ब्रुवन्नेव तदा ददर्श तपसां निधिम्।
तमव्ययमनौपम्यमचिन्त्यं शाश्वतं ध्रुवम्॥ ७॥
निष्कलं सकलं ब्रह्म निर्गुणं गुणगोचरम्।
योगिनां परमानन्दमक्षरं मोक्षसंज्ञितम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर तण्डि को उस तपोनिधि, अविनाशी, अनुपम, अचिन्त्य, नित्य, ध्रुव, शुद्ध, स्थूल, निर्गुण और सगुण ब्रह्म का दर्शन हुआ, जो आनंदस्वरूप, अविनाशी और योगियों का मोक्षस्वरूप है॥7-8॥
 
Saying this, Tandi got the darshan of that taponidhi, imperishable, incomparable, unthinkable, eternal, polar, pure, gross, nirgun and sagun Brahma, who is the form of bliss, imperishable and salvation of the yogis. 7-8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)