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mahabharat 13.17.60: जो लोग स्वार्थवश बहुत अधिक दक्षिणा देकर यज्ञ करते हैं, उनका भाग्य भी तुम्हारा ही है। इसमें कोई संदेह नहीं है ॥60॥   |   mahabharat अध्याय 13.17: उपमन्यु-श्रीकृष्ण-संवाद—महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 17: उपमन्यु-श्रीकृष्ण-संवाद—महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  13.17.60 
यजतां कामयानानां मखैर्विपुलदक्षिणै:।
या गतिर्यज्ञशीलानां सा गतिस्त्वं न संशय:॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
जो लोग स्वार्थवश बहुत अधिक दक्षिणा देकर यज्ञ करते हैं, उनका भाग्य भी तुम्हारा ही है। इसमें कोई संदेह नहीं है ॥60॥
 
The fate of those who perform sacrifices with abundant dakshina with a selfish motive is your own fate. There is no doubt about this. ॥ 60॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)