Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.17.45-46h: ये चन्द्रमा नामक पितृ पथ के द्वार हैं। ये काष्ठा, दिशा, संवत्सर और युग आदि भी हैं। दिव्य लाभ (देवलोक का सुख), आदिव्य लाभ (इस लोक का सुख), परम लाभ (मोक्ष), उत्तरायण और दक्षिणायन भी ये हैं। 45 1/2॥ | mahabharat अध्याय 13.17: उपमन्यु-श्रीकृष्ण-संवाद—महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अयं च पितृयानानां चन्द्रमा द्वारमुच्यते।
एष काष्ठा दिशश्चैव संवत्सरयुगादि च॥ ४५॥
दिव्यादिव्य: परो लाभ अयने दक्षिणोत्तरे।
अनुवाद
ये चन्द्रमा नामक पितृ पथ के द्वार हैं। ये काष्ठा, दिशा, संवत्सर और युग आदि भी हैं। दिव्य लाभ (देवलोक का सुख), आदिव्य लाभ (इस लोक का सुख), परम लाभ (मोक्ष), उत्तरायण और दक्षिणायन भी ये हैं। 45 1/2॥
These are the doors of the ancestral path called Chandrama. These are also Kashtha, Disha, Samvatsara and Yuga etc. Divya Labh (pleasure of Devlok), Adivya Labh (pleasure of this world), Param Labh (moksha), Uttarayan and Dakshinayan are also these. 45 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥