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mahabharat 13.17.4-6: मैं उन अजन्मा, अनादि, अनंत, हृदयहीन और परम सुखी, शक्तिशाली भगवान महादेवजी की शरण लेता हूँ, जिन्हें सांख्यशास्त्र के विद्वान् लोग परा, प्रधान, पुरुष, अधिष्ठाता और ईश्वर कहकर सदैव स्तुति करते हैं, जिनका चिन्तन करने में योगीजन तल्लीन रहते हैं, जिन्हें विद्वान पुरुष जगत की उत्पत्ति और संहार का कारण मानते हैं, जिनसे देवता, दानव और ऋषियों में भी कोई दूसरा श्रेष्ठ नहीं है॥4-6॥   |   mahabharat अध्याय 13.17: उपमन्यु-श्रीकृष्ण-संवाद—महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.17.4-6 
यं पठन्ति सदा सांख्याश्चिन्तयन्ति च योगिन:।
परं प्रधानं पुरुषमधिष्ठातारमीश्वरम्॥ ४॥
उत्पत्तौ च विनाशे च कारणं यं विदुर्बुधा:।
देवासुरमुनीनां च परं यस्मान्न विद्यते॥ ५॥
अजं तमहमीशानमनादिनिधनं प्रभुम्।
अत्यन्तसुखिनं देवमनघं शरणं व्रजे॥ ६॥
 
 
अनुवाद
मैं उन अजन्मा, अनादि, अनंत, हृदयहीन और परम सुखी, शक्तिशाली भगवान महादेवजी की शरण लेता हूँ, जिन्हें सांख्यशास्त्र के विद्वान् लोग परा, प्रधान, पुरुष, अधिष्ठाता और ईश्वर कहकर सदैव स्तुति करते हैं, जिनका चिन्तन करने में योगीजन तल्लीन रहते हैं, जिन्हें विद्वान पुरुष जगत की उत्पत्ति और संहार का कारण मानते हैं, जिनसे देवता, दानव और ऋषियों में भी कोई दूसरा श्रेष्ठ नहीं है॥4-6॥
 
I take refuge in that unborn, eternal, infinite, heartless and supremely happy, powerful God, Mahadevji, whom the scholars of Sankhya Shastra always praise as Para, Pradhan, Purusha, Adhishthata and Ishwar, whom the Yogis remain engrossed in thinking about, whom the learned men consider to be the cause of the creation and destruction of the world, whom there is no other superior even among the gods, demons and sages.॥ 4-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)