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mahabharat 13.17.29-30: जो सनातन ब्रह्म देवताओं, दानवों और ऋषियों के लिए भी गुप्त है, जो हृदय में निवास करता है और ध्यानस्थ मुनि के लिए भी अगम्य रहता है, वही परमेश्वर है। वह सबका रचयिता है। सब दिशाओं में उसके मुख हैं। वह विश्वात्मा, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ है॥ 29-30॥   |   mahabharat अध्याय 13.17: उपमन्यु-श्रीकृष्ण-संवाद—महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.17.29-30 
देवासुरमुनीनां तु यच्च गुह्यं सनातनम्।
गुहायां निहितं ब्रह्म दुर्विज्ञेयं मुनेरपि॥ २९॥
स एष भगवान‍् देव: सर्वकृत् सर्वतोमुख:।
सर्वात्मा सर्वदर्शी च सर्वग: सर्ववेदिता॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जो सनातन ब्रह्म देवताओं, दानवों और ऋषियों के लिए भी गुप्त है, जो हृदय में निवास करता है और ध्यानस्थ मुनि के लिए भी अगम्य रहता है, वही परमेश्वर है। वह सबका रचयिता है। सब दिशाओं में उसके मुख हैं। वह विश्वात्मा, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ है॥ 29-30॥
 
The eternal Brahma who is hidden even for the gods, demons and sages, who resides in the heart and remains incomprehensible even for the meditative sage, is the same God. He is the creator of all. He has faces in all directions. He is the universal soul, omniscient, omnipresent and omniscient.॥ 29-30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)