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वैशम्पायन उवाच
एवं सम्भाषमाणे तु गाङ्गेये पुरुषर्षभे।
तूष्णीं बभूव कौरव्यो मध्ये तेषां महात्मनाम्॥ ६२॥
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! महापुरुष गंगापुत्र भीष्म के मुख से यह सुनकर, उन महामनस्वी पुरुषों के बीच बैठे हुए कुरुपुत्र युधिष्ठिर चुप हो गए।
Vaishmpayana says: Janamejaya! Upon hearing this from the great man, son of Ganga, Bhishma, Yudhishthira, the son of the Kuru clan, sitting amidst those great-minded men, became quiet. 62.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥