|
| |
| |
श्लोक 13.169.54  |
एतदत्यद्भुतं वृत्तं पुण्ये हि भवति प्रभो।
वासुदेवस्य कौन्तेय स्थाणोश्चैव स्वभावजम्॥ ५४॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| हे प्रभु! कुन्तीनन्दन! भगवान् श्रीकृष्ण और महादेवजी की यह अद्भुत एवं स्वाभाविक कथा प्राचीन काल में पवित्र पर्वत हिमालय पर घटित हुई थी। 54॥ |
| |
| Lord! Kuntinandan! This wonderful and natural story of Lord Shri Krishna and Mahadevji took place in ancient times on the holy mountain Himalayas. 54॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|