श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 169: भगवान‍् श्री कृष्णकी महिमाका वर्णन और भीष्मजीका युधिष्ठिरको राज्य करनेके लिये आदेश देना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  13.169.54 
एतदत्यद्भुतं वृत्तं पुण्ये हि भवति प्रभो।
वासुदेवस्य कौन्तेय स्थाणोश्चैव स्वभावजम्॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! कुन्तीनन्दन! भगवान् श्रीकृष्ण और महादेवजी की यह अद्भुत एवं स्वाभाविक कथा प्राचीन काल में पवित्र पर्वत हिमालय पर घटित हुई थी। 54॥
 
Lord! Kuntinandan! This wonderful and natural story of Lord Shri Krishna and Mahadevji took place in ancient times on the holy mountain Himalayas. 54॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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