श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 169: भगवान‍् श्री कृष्णकी महिमाका वर्णन और भीष्मजीका युधिष्ठिरको राज्य करनेके लिये आदेश देना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  13.169.50 
धर्मेणापि सदा राजन् प्रजा रक्षितुमर्हसि।
यस्तस्य विपुलो दण्ड: सम्यग्धर्म: स कीर्त्यते॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! आपको सदैव धर्मपूर्वक अपनी प्रजा की रक्षा करनी चाहिए। प्रजा की रक्षा के लिए उचित दण्ड का प्रयोग ही धर्म कहलाता है।
 
O King! You should always protect your subjects in a righteous manner. The punishment used appropriately for the protection of subjects is itself called Dharma. 50.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas