|
| |
| |
श्लोक 13.169.2  |
प्रावृषीव च पर्जन्यो ववृषे निर्मलं पय:।
तमश्चैवाभवद् घोरं दिशश्च न चकाशिरे॥ २॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| वर्षा ऋतु की भाँति बादलों से निर्मल जल बरसने लगा। सर्वत्र अन्धकार छा गया। दिशाएँ सूझ नहीं रही थीं। |
| |
| Like the rainy season, the clouds started pouring down pure water. Darkness spread everywhere. Directions were not visible. |
| ✨ ai-generated |
| |
|