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mahabharat 13.165.d41-d42: देवताओं द्वारा उत्पन्न इन दस दोषों से योगीजन व्याकुल रहते हैं; अतः पहले इन दस दोषों को दूर करके अपना मन ईश्वर में एकाग्र करो। योग के निम्नलिखित आठ गुण बताए गए हैं, जिनसे दैवी ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।   |   mahabharat अध्याय 13.165: योगधर्मका प्रतिपादनपूर्वक उसके फलका वर्णन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 165: योगधर्मका प्रतिपादनपूर्वक उसके फलका वर्णन]  »  श्लोक d41-d42
 
 
श्लोक  13.165.d41-d42 
एतैस्तेषां भवेद् विघ्नो दशभिर्देवकारितै:।
तस्मादेतानपास्यादौ युञ्जीत च परं मन:॥
इमानपि गुणानष्टौ योगस्य परिचक्षते।
गुणैस्तैरष्टभिर्दिव्यमैश्वर्यमधिगम्यते॥
 
 
अनुवाद
देवताओं द्वारा उत्पन्न इन दस दोषों से योगीजन व्याकुल रहते हैं; अतः पहले इन दस दोषों को दूर करके अपना मन ईश्वर में एकाग्र करो। योग के निम्नलिखित आठ गुण बताए गए हैं, जिनसे दैवी ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
 
Yogis are troubled by these ten defects created by the gods; Therefore, first remove these ten defects and concentrate your mind on God. The following eight qualities of Yoga are mentioned, with which one attains divine opulence.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)