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mahabharat 13.165.d32-d33: मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठित करने के बाद, दोनों भौंहों के बीच मनका अवरूद्ध करें। इसके बाद प्राण को पूर्णतः रोककर ईश्वर का चिंतन करें। प्राण को प्राण में और प्राण को कर्म में संयोजित करें। फिर प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणायाम के लिए तैयार हो जाएँ।   |   mahabharat अध्याय 13.165: योगधर्मका प्रतिपादनपूर्वक उसके फलका वर्णन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.165.d32-d33 
मूर्धन्यात्मानमाधाय भ्रुवोर्मध्ये मनस्तथा।
संनिरुध्य तत: प्राणानात्मानं चिन्तयेत् परम्॥
प्राणे त्वपानं युञ्जीत प्राणांश्चापानकर्मणि।
प्राणापानगती रुद्‍ध्वा प्राणायामपरो भवेत्॥
 
 
अनुवाद
मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठित करने के बाद, दोनों भौंहों के बीच मनका अवरूद्ध करें। इसके बाद प्राण को पूर्णतः रोककर ईश्वर का चिंतन करें। प्राण को प्राण में और प्राण को कर्म में संयोजित करें। फिर प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणायाम के लिए तैयार हो जाएँ।
 
After installing the soul in the idol, block the bead between the two eyebrows. After that, stop your life completely and think about God. Combine your life in your life and your life in your work. Then stop the movement of prana and apana and get ready for pranayama.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)