| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 165: योगधर्मका प्रतिपादनपूर्वक उसके फलका वर्णन] » श्लोक d3-d4 |
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| | | | श्लोक 13.165.d3-d4  | स चाष्टगुणमैश्वर्यमधिकृत्य विधीयते।
सायुज्यं सर्वदेवानां योगधर्म: पराश्रित:॥
ज्ञानं सर्वस्य योगस्य मूलमित्यवधारय।
व्रतोपवासनियमै: तत् सर्वं चापि बृंहयेत्॥ | | | | | | अनुवाद | | अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व इन आठ ऐश्वर्यों को साधकर योग का अनुष्ठान किया जाता है। योगधर्म सभी देवताओं के मिलन पर निर्भर है। समझ लीजिए कि ज्ञान ही समस्त योगों का मूल है। साधक को व्रत, उपवास और नियम के द्वारा उस सम्पूर्ण ज्ञान को बढ़ाना चाहिए। | | | | The ritual of Yoga is performed by mastering the eightfold opulence of Anima, Mahima, Garima, Laghima, Prapti, Prakamya, Ishitva, Vashitva. Yogadharma is dependent on the union of all the Gods. Understand that knowledge is the root of all yoga. The seeker should increase that complete knowledge through fasting, fasting and rules. | | ✨ ai-generated | | |
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