श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 165: योगधर्मका प्रतिपादनपूर्वक उसके फलका वर्णन]  »  श्लोक d26-d28
 
 
श्लोक  13.165.d26-d28 
प्राणानां संनिपातेषु संसर्गाद् य: प्रजायते।
ऊष्मा सोऽग्निरिति ज्ञेय: सोऽन्नं पचति देहिनाम्॥
अपानप्राणयोर्मध्ये व्यानोदानावुपाश्रितौ।
समन्वित: समानेन सम्यक् पचति पावक:॥
शरीरमध्ये नाभि: स्यान्नाभ्यामग्नि: प्रतिष्ठित:।
अग्नौ प्राणाश्च संयुक्ता प्राणेष्वात्मा व्यवस्थित:॥
 
 
अनुवाद
समस्त प्राणों के संयोग से जो ऊष्मा प्रकट होती है, उसे अग्नि जानना चाहिए। वही अग्नि प्राणियों द्वारा खाए गए अन्न का पाचन करती है। व्यान और उदान वायु, अपान और प्राण वायु के मध्य भाग में स्थित हैं। उसी वायु से युक्त अग्नि, अन्न का पाचन भली-भाँति करती है। नाभि शरीर के मध्य भाग में है। नाभि के भीतर अग्नि विद्यमान है। प्राण अग्नि से जुड़ा है और प्राण में आत्मा का निवास है।
 
The heat that appears as a result of fusion of all the vital elements should be known as fire. That fire digests the food eaten by the living beings. Vyana and Udan Vayu are situated in the middle part of Apana and Prana Vayu. Agni mixed with the same air digests the food properly. The navel is in the middle part of the body. Fire is present within the nucleus. Life is connected to fire and the soul resides in life.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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