श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 165: योगधर्मका प्रतिपादनपूर्वक उसके फलका वर्णन]  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  13.165.d1 
श्रीमहेश्वर उवाच
सांख्यज्ञाने नियुक्तानां यथावत् कीर्तितं मया।
योगधर्मं पुन: कृत्स्नं कीर्तयिष्यामि ते शृणु॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले- देवी! मैंने सांख्य ज्ञान में लगे हुए लोगों के धर्म का यथार्थ रूप से वर्णन किया है। अब मैं तुम्हें पुनः सम्पूर्ण योग धर्म समझाता हूँ, सुनो।
 
Shri Maheshwar said- Devi! I have described the religion of those who are engaged in the knowledge of Sankhya in its true form. Now I will again explain the complete Yoga Dharma to you, listen.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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