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mahabharat 13.164.d20-d21: इनमें से शरीर या मन में प्रसन्नता की भावना को सात्विक भावना मानें और अन्य भावनाओं को अनदेखा करें। जब मन में व्यथा की भावना हो जो चिड़चिड़ाहट पैदा करती है, तो उसे रजोगुण की प्रवृत्ति समझें।   |   mahabharat अध्याय 13.164: सांख्यज्ञानका प्रतिपादन करते हुए अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वोंकी उत्पत्ति आदिका वर्णन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 164: सांख्यज्ञानका प्रतिपादन करते हुए अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वोंकी उत्पत्ति आदिका वर्णन]  »  श्लोक d20-d21
 
 
श्लोक  13.164.d20-d21 
तत्र यत् प्रीतिसंयुक्तं कायेन मनसापि वा।
वर्तते सात्त्विको भाव इत्युपेक्षेत तत् तदा॥
यदा संतापसंयुक्तं चित्तक्षोभकरं भवेत्।
वर्तते रज इत्येव तदा तदभिचिन्तयेत्॥
 
 
अनुवाद
इनमें से शरीर या मन में प्रसन्नता की भावना को सात्विक भावना मानें और अन्य भावनाओं को अनदेखा करें। जब मन में व्यथा की भावना हो जो चिड़चिड़ाहट पैदा करती है, तो उसे रजोगुण की प्रवृत्ति समझें।
 
Among these, the feeling of happiness in the body or mind is considered as Sattvik feeling and ignore other feelings. When there is a feeling of anguish in the mind that causes irritation, then consider it as a tendency of Rajoguna.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)