श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 164: सांख्यज्ञानका प्रतिपादन करते हुए अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वोंकी उत्पत्ति आदिका वर्णन]  »  श्लोक d17-d18
 
 
श्लोक  13.164.d17-d18 
कामक्रोधौ मनस्तापो लोभो मोहस्तथा मृषा।
प्रवृद्धे परिवर्धन्ते रजस्येतानि सर्वश:॥
विषाद: संशयो मोहस्तन्द्री निद्रा भयं तथा।
तमस्येतानि वर्धन्ते प्रवृद्धे हेत्वहेतुकम्॥
 
 
अनुवाद
काम, क्रोध, क्लेश, लोभ, मोह और मिथ्या भाषण - ये सब दुर्गुण रजोगुण की वृद्धि से बढ़ते हैं। दुःख, संशय, मोह, आलस्य, निद्रा, भय - ये सब तमोगुण की वृद्धि से बढ़ते हैं।
 
Lust, anger, mental distress, greed, attachment and false speech – all these vices increase with the increase of Rajoguna. Sadness, doubt, attachment, laziness, sleep, fear – these increase when Tamoguna increases.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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