श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 164: सांख्यज्ञानका प्रतिपादन करते हुए अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वोंकी उत्पत्ति आदिका वर्णन]  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  13.164.d1 
श्रीमहेश्वर उवाच
सांख्यज्ञानं प्रवक्ष्यामि यथावत् ते शुचिस्मिते।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मर्त्य: संसारेषु प्रवर्तते॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले - शुचिस्मिते! अब मैं तुम्हें सांख्य का यथार्थ ज्ञान बताऊँगा, जिसे जानकर मनुष्य फिर संसार के बंधन में नहीं पड़ता।
 
Shri Maheshwar said – Shuchismite! Now I will describe to you the true knowledge of Sankhya, knowing which a person does not fall into the bondage of the world again.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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