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mahabharat 13.163.d97: शरीर की मृत्यु निश्चित और अपरिहार्य है। हर कोई कुछ समय के लिए यहाँ रहता है और फिर पुनः काल के अधीन हो जाता है।   |   mahabharat अध्याय 13.163: मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.163.d97 
मरणं हि शरीरस्य नियतं ध्रुवमेव च।
तिष्ठन्नपि क्षणं सर्व: कालस्यैति वशं पुन:॥
 
 
अनुवाद
शरीर की मृत्यु निश्चित और अपरिहार्य है। हर कोई कुछ समय के लिए यहाँ रहता है और फिर पुनः काल के अधीन हो जाता है।
 
Death of the body is certain and inevitable. Everyone stays here for a while and then again becomes subject to time.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)