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श्लोक  13.163.d83 
व्याधिभि: पीड्यमानस्य नित्यं शारीरमानसै:।
नरस्याकृतकृत्यस्य किं सुखं मरणे सति॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य सदैव शारीरिक और मानसिक रोगों से ग्रस्त रहता है और अपनी अधूरी इच्छाओं के साथ ही मर जाता है। तो फिर यहाँ सुख कैसा?
 
Man always suffers from physical and mental diseases and dies with his unfulfilled desires. So what happiness is there here?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)